आज मैं एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी में बैठा सोच रहा हूँ कि एक छप्पर के नीचे खाद वाली खाली बोरी पे बैठ के पंडित जी का इंतज़ार किया करते थे। पंडित जी एक पुरानी साइकिल से पसीने में भीगे चले आते थे। उन्हें देखते ही मैं घर दौड़ जाता था। अम्मी से कहता पंडित जी आ गए हैं। अम्मी तुरंत चाय बनाने लगतीं और किसी छोटे भाई को दुकान पे भेजा जाता, पंडित जी की डबलरोटी (मठरी) लाने के लिए। पंडित जी आते ही पूछते, 'मोइन मियां चाय बन गयी?' हम अपना होमवर्क चेक करा के पंडित जी की चाय लाते। शायद वो चाय उतनी मीठी नही होती थी जितनी मीठी उनकी बोली होती थी। हमारे घर वालों के सामने हमारी तारीफों के पुल बांधने में तनिक भी न चूकते थे।आज इस शानदार लाइब्रेरी में बैठा उन्ही के बारे में ख्याल कर रहा था। कि वो आज भी उसी पुरानी साइकिल से पतली पगडंडियों पर बच्चों को पढ़ाने गांव गांव जाते होंगे। ना जाने कितने बच्चों के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते होंगे। हमारे जैसों के भविष्य की नींव डालने में पूरी जान लगाते होंगे।
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सुंदर मजदूर कितनी सुन्दर है वह मजदूर जिससे समाज है कितना दूर दिनभर ढोती है सिर पर ईंटें उसका पति है चुनता जाता उसका सांवला चेहरा काली ज़ुल्फ़...
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Dear Kalaam, you were a missile man But 4 me you are a great soul U were not born to die U died to be immortal U r not witnessed by my eye...
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आज मैं एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी में बैठा सोच रहा हूँ कि एक छप्पर के नीचे खाद वाली खाली बोरी पे बैठ के पंडित जी का इंतज़ार किया करते थे। ...
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Rattling of water on the rocks Echoing of chirps in the open forests Fleet of the running deer herds Taciturnity of the deep valleys Reminds...
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