Monday, March 17, 2025

 सुंदर मजदूर

कितनी सुन्दर है वह मजदूर

जिससे समाज है कितना दूर

दिनभर ढोती है सिर पर ईंटें

उसका पति है चुनता जाता

उसका सांवला चेहरा काली ज़ुल्फ़ों में

जैसे काले नभ में है चाँद है दमकता

उसके सूखे होंठ और पिचके गाल

कह रहे हैं जीवन की करुण गाथा

उसकी धंसी हुईं आँखें

दर्शाती जीवन की गहराई 

उसने अपने जीर्ण वस्त्र शरीर पर ऐसे हैं लपेटे

तभी तो दुनिया की नज़रों से बच पायी

कितने सुन्दर हैं उसके नगे पाँव

दिनभर पथरीली भूमि को कुचलते

जब सुनती पास लेटे बच्चे का रुदन

दौड़कर जाती

छाती से लिपटाकर पिलाती उसको दूध

कितनी सुन्दर है वह मजदूर 

कितनी सुंदर है वह मजदूर


Self Composed

#International_Labour_Day

 THE SPRING DREAM

I used to run over air in my dreams

A swarm of bees used to escort me

I used to see an old lady harvesting lentils

Buffaloes fleeing towards the river.

The Warbling Nightingale in the blooming orchard

The flock of parrots in the morning sky

A gentle gale waving her hair

Picking of guavas by a bunch of kids

I was startled from my dream

It is evening, I catch sight of

The lady wiping her tears 

Her crop is devastated by frost

An array of buffalows in the dusty countryside

Returning home with tired feet

A fierce storm ripped through the orchards.

The nightingle has lost its babies

Crows are cawing in the dusk

Hot loo is scrouging the old man

Children are crying over ruined orchard

The dimming sky is overcast by dust

With tired steps, I am crossing the dust wall.

-Moin Khan

Tuesday, January 25, 2022

पंडित जी

 आज मैं एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी में बैठा सोच रहा हूँ कि एक छप्पर के नीचे खाद वाली खाली बोरी पे बैठ के पंडित जी का इंतज़ार किया करते थे। पंडित जी एक पुरानी साइकिल से पसीने में भीगे चले आते थे। उन्हें देखते ही मैं घर दौड़ जाता था। अम्मी से कहता पंडित जी आ गए हैं। अम्मी तुरंत चाय बनाने लगतीं और किसी छोटे भाई को दुकान पे भेजा जाता, पंडित जी की डबलरोटी (मठरी) लाने के लिए। पंडित जी आते ही पूछते, 'मोइन मियां चाय बन गयी?' हम अपना होमवर्क चेक करा के पंडित जी की चाय लाते। शायद वो चाय उतनी मीठी नही होती थी जितनी मीठी उनकी बोली होती थी। हमारे घर वालों के सामने हमारी तारीफों के पुल बांधने में तनिक भी न चूकते थे।आज इस शानदार लाइब्रेरी में बैठा उन्ही के बारे में ख्याल कर रहा था। कि वो आज भी उसी पुरानी साइकिल से पतली पगडंडियों पर बच्चों को पढ़ाने गांव गांव जाते होंगे। ना जाने कितने बच्चों के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते होंगे। हमारे जैसों के भविष्य की नींव डालने में पूरी जान लगाते होंगे।

-मोइन खान

Hey Rikshaw

People call me 'Hey Rikshaw'
No one knows me by my name.
Despite I am not eager to accept this identity,
But I have to respond.
Whether it is scorching heat,
Or it chilling cold.
This road is my habitat
This rikshaw is my scraggly bed.
A bike crashed me yesterday,
My leg and hand are bleedy
But I have to go for livelihood.
My family is waiting for me,
They want new clothes on this Eid.
Although I have a single dress,
But I'll bring for them.
I'll take less food, I'll miss my lunch.
But I'll make more money for my family.
They are waiting for me.
-Moin Khan

Sir Syed


Kuch rang faza me bikhre hain
Ek khushbu hawa me chayyi hai
Aur chaand hua hai madhyam sa
Sir syed wali eid hai aaj.....
Hai AMU dulhan bani huyi
Kuche aur galiyan saji huin
Har alig ko mubarak baad hai aaj
Sir syed wali eid hai aaj....
Saari duniya se ladkar bhi
Jisne AMU taameer kiya
Us rahbar ki ham ruhani aulaad
Sir syed waali eid hai aaj....
- Moin Khan

Dear Kalaam

 

Dear Kalaam, you were a missile man
But 4 me you are a great soul
U were not born to die
U died to be immortal
U r not witnessed by my eyes
But I can see u in d cluster of stars
U r seeing the millions of dreams
Flowering n flourishing by ur fellows
Your serene thoughts give us
A new energy to revive our nation.
-MoinKhan

रद्दी वाला

 

मैं हल्की नींद में था,
वो चिल्लाया, ''रद्दी दे दो'
आंख खुल गयी
सोचा क्यूँ न इसको रद्दी दे दूं
दिल के कमरे की
बहुत रद्दी जमा हो गयी है
हर कोने में रद्दी पड़ी है
कहीं बुरे ख्यालों की रद्दी
कहीं अना की रद्दी
कहीं हसद की रद्दी
कहीं तकब्बुर की रद्दी
कहीं लालच की रद्दी
मैं आंखें मसलते हुए उठा
दरवाज़ा खोला तो देखा
उसे दूर रास्ते पे
ओझल होते हुए
मैंने दरवाज़ा बंद किया
फिर आ के सो गया।
-मोईन खान

 सुंदर मजदूर कितनी सुन्दर है वह मजदूर जिससे समाज है कितना दूर दिनभर ढोती है सिर पर ईंटें उसका पति है चुनता जाता उसका सांवला चेहरा काली ज़ुल्फ़...